रायपुर प्रखंड के पर्वतीय गांव में सैकड़ों बीघा धान की फसल पत्ती लपेटक किट की चपेट में आने से बर्बाद हो रही है। कृषि विभाग से मिलने वाली दवा भी इस रोग को रोक पाने में नाकाम साबित हो रही है। इससे किसान परेशान हैं। उन्होंने जल्द से जल्द मुआवजा देने की मांग की है।
धान की फसल पर कीट का प्रकोप
डोईवाला विधानसभा के अंतर्गत रायपुर प्रखंड की ग्राम पंचायत ग्राम कोटी मयचक, थानो, सीरियो, चौकियो, घंडोल, कुड़ियाल, तलाई, रामनगर डांडा आदि तमाम गांव में धान की फसल इस कीट के आने से काली पड़कर पूरी तरह से सूख रही है। जोकि पराली के रूप में पशु चारे के रूप में भी काम आने लायक नहीं रह जाएगी।
किसानों को उठाना पड़ सकता है बड़ा नुकसान
इस रोग के फैलने की तीव्रता इतनी तेज है कि अगर जल्द इस पर अंकुश नहीं लगाया गया तो यह तमाम दलहन व अन्य फसलों को पूरी तरह से बर्बाद कर देगा। जिससे कि किसानों को बड़ा आर्थिक नुकसान भी उठाना पड़ेगा।
कोटिमयचक की ग्राम प्रधान रेखा बहुगुणा व रमेश सोलंकी का कहना है कि किसानों को इस रोग में किस दवा का छिड़काव करना चाहिए, यह जानकारी भी सही तरह से प्राप्त नहीं हो रही है।
सैकड़ों बीघा फसल बर्बाद
वहीं सिरियो गांव के फतेह सिंह सोलंकी, देव पाल सिंह रावत, तेग सिंह पुंडीर ,नारायण सिंह रावत, मनोहर सिंह, भगवान सिंह सोलंकी, सुलोचना बहुगुणा, थानो ग्राम सभा के प्रधान प्रतिनिधि चंद्रप्रकाश तिवारी आदि का कहना है कि सैकड़ों बीघा फसल बर्बाद हो गई है। उन्होंने सरकार से मुआवजे की मांग की है। धान में लगे रोग की जानकारी नहीं है।
विभाग के पास नहीं कोई दवा
फसल को रोग से मुक्त करने के लिए जो दवा प्राप्त हुई थी, वह पूर्व में ही वितरित कर दी गई है। वर्तमान में विभाग के पास कोई दवा उपलब्ध नहीं है। क्षेत्र में धान की फसल के रकबे की भी जानकारी नहीं है।
शुरू में पत्ते में आ जाते हैं सफेद चकते
रायपुर के सहायक कृषि अधिकारी विजेंद्र सिंह नेगी के अनुसार, यह रोग पत्ती लपेटक कीट के चलते आया है। यह कीट अपना लार्वा पौधे पर छोड़ देता है, जो बाद में तितली बन जाता है। इसमें शुरू में पत्ते में सफेद चकते आ जाते हैं, जिसके बाद हरी पत्तियां सफेद होने लगती हैं। वहीं जब यह सूखने लगती है तो वर्षा हो जाने पर यह पूरी तरह से काली पड़ जाती है।
पूर्ण चपेट में आ गई फसल को बचाना मुश्किल
ढकरानी कृषि विज्ञान केंद्र के कृषि विशेषज्ञ संजय राठी के अनुसार, इस रोग की पूर्ण चपेट में आ गई फसल को बचाना नामुमकिन है लेकिन, जो अभी हल्की प्रभावित हुई है। उसमें जरूरी दवा का छिड़काव कर बचाया जा सकता है। उन्होंने कहा कि किसान अज्ञानता में गलत दवा का छिड़काव कर देते हैं, जिसके चलते किसानों को यह नुकसान उठाना पड़ता है।
इनमें से किसी एक दवाई का करें उपयोग
- कार्टाहाइड्रोकलोराइड – 750 ग्रा/ हेक्टेयर या 70 ग्रा /बीघा
- फ़्रिपोनिल 5एफसी – 1ली. / हेक्टेयर या 80 मिमी/ बीघा
- क्लोरएंट्रीनिपोल – 150ग्रा/ हेक्टेयर या 12 ग्रा/ बीघा
- जैविक खेती वाले किसान नीम का तेल – 10 मिमी/लीटर पानी में प्रत्येक 8 दिन में छिड़काव करें।