हिमनद झीलों पर अर्ली वार्निंग सिस्टम लगने के बाद वे कितना सटीक और कारगर हैं, पता चल सकेगा। पर इसके साथ जरूरी है कि नदी के 200 मीटर तक फ्लड प्लेन एरिया में लोग न बसें।
भोटेकोशी की घटना के बाद अर्ली वार्निंग सिस्टम को लेकर चर्चा तेज हो गई है। वैज्ञानिकों भी अर्ली वार्निंग सिस्टम की जरूरत बता रहे हैं, पर नदी के किनारे बसावट न हो, इस पर अधिक ध्यान देने की सलाह भी दे रहे हैं। इससे लोगों की सुरक्षा हो सकेगी। वहीं, केदारनाथ, चमोली, धराली और अब नेपाल के भोटेकोशी में आई आपदा के अलग-अलग कारण थे। पर इन घटनाओं में संकरी घाटी, तीव्र ढलान के साथ ही तेज बहाव के साथ पानी, मलबा बोल्डर आने की बात एक जैसी रही है, जिसने कुछ समय में ही भारी तबाही मचा दी।
उत्तराखंड में अर्ली वार्निंग सिस्टम लगाने की हो रही कवायद